64 Yogini Mantras & Vidhi of Mantra Jaap with pujan samaghri

The 64 Yoginis are powerful Tantric goddesses associated with Maha Kali, each embodying distinct energies for spiritual transformation. Their names and mantras vary slightly across Tantric texts like the Yogini Tantra, but common lists draw from temple traditions and scriptures.

## Common 64 Yogini Names
Traditional lists from sources like Hirapur and Ranipur-Jharial temples include these core names (partial list for brevity; full sets often exceed 64 with variations):

- Bahurupa (बहुरूपा)
- Tara (तारा)
- Narmada (नर्मदा)
- Yamuna (यमुना)
- Shanti (शांति)
- Varuni (वरुनी)
- Kshemankari (क्षेमंकरी)
- Dakini (डाकिनी)
- Rakini (राकिनी)
- Lakini (लाकिनी)
- Shakini (शाकिनी)
- Hakini (हाकिनी)
- Bhairavi (भैरवी)
- Matangi (मातंगी)
- Kamala (कमला)
- Chinnamasta (छिन्नमस्ता)
- Bhuvaneshwari (भुवनेश्वरी)
- Annapurna (अन्नपूर्णा)
- Lalita (ललिता)
- Meghamala (मेघमाला)

## Sample Mantras
Mantras are chanted for invoking their shaktis, often prefixed with "Om Aim Hrim Shrim" and ending in "Svaha." Brief examples from Tantric namavali:

| Yogini       | Brief Mantra                          | Purpose                 
|------------|----------------------------------|-------------------
| Dakini  | ॐ डाकिनी मदशालिनी स्वाहा   | Rapture                                                                 and mind control |
| Rakini | ॐ राकिनी पाप राशिनी स्वाहा   |  Destruction of sins      |
| Tara   | ॐ तार योग रक्त पूर्णा स्वाहा  | Yogic union and passion  |
| Bhairavi | ॐ ऐं ह्रीं श्रीं भैरवी स्वाहा  | Fearlessness, protection |
| Matangi  | ॐ ऐं ह्रीं श्रीं मातंगी स्वाहा | Wisdom and arts          
| Kamakhya | ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कामाख्या स्वाहा | Desire fulfillment      |

## Tantric Context
These devis reside in chakras or cosmic realms, aiding sadhana for siddhis like attraction or liberation. Practice under guru guidance during auspicious nights like Ashtami.
64 योगिनियों की पूजा विधि

64 योगिनियों की पूजा तांत्रिक साधना का महत्वपूर्ण अंग है, जो मां दुर्गा की 64 शक्तियों को आमंत्रित कर सिद्धियां प्रदान करती है। यह विधि शास्त्रीय ग्रंथों और मंदिर परंपराओं जैसे हिरापुर या ग्वालियर से ली गई है, गुरु मार्गदर्शन में ही करें।

## समय और दिशा
रात्रि 9 से 11 बजे के बीच पश्चिम मुख या मंदिर दिशा में बैठें। नवरात्रि, अमावस्या या सोमवार को विशेष फलदायी। 

## सामग्री
- चौसठ योगिनी यंत्र या महायंत्र।
- लाल वस्त्र, तेल का दीपक, सिंदूर (64 बिंदियां), लाल पुष्प, अक्षत, चंदन, धूप, घी-अहुति के लिए हवन सामग्री।
- गेहूं की 64 ढेरियां (8x8 चक्र) साधारण पूजा में। 

## चरणबद्ध विधि
1. स्नान कर गणेश-गुरु-शिव पूजन करें (ॐ गण गणपतये नमः या ॐ नमः शिवाय एक माला)।
2. लाल वस्त्र पर यंत्र स्थापित कर दीपक जलाएं, 64 योगिनी शक्तियों का ध्यान करें, सिंदूर बिंदियां लगाएं। 
3. 64 योगिनी मंत्रों का जाप कर प्रत्येक पर लाल पुष्प अर्पित करें (पूर्ण सूची पिछले संवाद में; प्रत्येक मंत्र अंत में स्वाहा)। 
4. चक्र पूजन: 64 कोष्ठ बनाकर आह्वान, अक्षत-पुष्प छोड़ें, हवन में प्रत्येक नाम से आहुति दें (ॐ दिव्य योगाय नमः स्वाहा आदि)। 
5. आरती, प्रसाद वितरण के बाद विश्राम। अनुष्ठान में कुंडलिनी जागरण सहित तांत्रिक क्रिया जोड़ें। 

## सावधानियां
गुरु रहित साधना विघ्नकारी; स्त्री साधक के साथ चक्र पूजा (कौल मार्ग) उन्नत स्तर पर। लाभ: विघ्न नाश, धन-व्यापार वृद्धि। 
64 योगिनी पूजा तांत्रिक शक्ति साधना है जो भौतिक-सांसारिक लाभ के साथ आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करती है। लाभ कठिन कार्य सिद्धि, विघ्न नाश और शक्ति प्राप्ति में मिलते हैं, जबकि सावधानियां गुरु अनिवार्यता और शुद्धता पर केंद्रित हैं। मुख्य लाभबाधाएं दूर कर कठिन कार्य सिद्धि, धन-समृद्धि और सफलता प्राप्ति। नकारात्मक ऊर्जा, काला जादू और बुरी आत्माओं से सुरक्षा। स्वास्थ्य सुधार, ग्रह दोष निवारण (राहु-केतु-शनि), विवाह-संतान-करियर में सफलता। आध्यात्मिक जागरण, अंतर्ज्ञान वृद्धि और मोक्ष मार्ग प्रशस्ति। सावधानियांगुरु मार्गदर्शन के बिना न करें; विघ्न या हानि हो सकती है। पूजा काल में मांसाहार, नशा, मैथुन से दूर रहें; यंत्र को गंदे हाथों से न छुएं। रजस्वला अवस्था में स्त्रियां न स्पर्शें; लाभ गोपनीय रखें। शुद्ध मन से नवरात्रि या अमावस्या पर करें। 
64 योगिनी पूजा के लिए विशेष सामग्री तांत्रिक विधि पर आधारित होती है, जो यंत्र स्थापना, चक्र पूजन और हवन के लिए आवश्यक है। ये सामग्रियां शक्ति आह्वान को मजबूत बनाती हैं, खासकर नवरात्रि या अमावस्या पर। यंत्र और आसनचौसठ योगिनी यंत्र या महायंत्र (तांबे/चांदी का)। लाल या काला सूत्र वस्त्र, पाटा (लकड़ी का आसन)। चक्र पूजन हेतुगेहूं या जौ के 64 ढेरियां (8x8 चक्राकार, पश्चिम से पूर्व की ओर)।लाल रंग का चावल (कुमकुम/रोली मिश्रित), फूल (सभी रंगों के पंखुड़ियां), अक्षत। पूजन सामग्रीकलश (64 के आसपास), सिंदूर (64 बिंदियां), चंदन, लाल पुष्प, पान-सुपारी।धूप (गुग्गल/लोबान), तेल का दीपक (सरसों का तेल), नैवेद्य (लाल मिठाई/फल)। हवन सामग्रीशुद्ध घी, हवन द्रव्य: 50 ग्राम चावल + 50 ग्राम जौ + 50 ग्राम सरसों तेल + 11 काली मिर्च + 11 लौंग + सरसों दाने (मुट्ठी भर) + 1 चम्मच नमक + 1 लाल मिर्च + 5 इलायची + फूल पंखुड़ियां। स्वयं तैयार करें। गुरु से विधि ग्रहण कर शुद्ध भाव से उपयोग करें। 
64 योगिनी पूजा का सटीक मंत्र जाप तांत्रिक परंपरा में गुरु दीक्षा के बाद किया जाता है, जिसमें प्रत्येक योगिनी का नाममंत्र "ॐ [नाम] स्वाहा" रूप में जपते हैं। विधि सोमवार, अमावस्या या पूर्णिमा रात्रि को शुद्ध स्नान के बाद गणेश-गुरु-शिव पूजन से प्रारंभ होती है। जाप पूर्व प्रक्रियास्नान कर पूर्व या पश्चिम मुख बैठें। गणेश मंत्र (ॐ गण गणपतये नमः) व गुरु/शिव मंत्र (ॐ नमः शिवाय) की 1-1 माला जपें। शिवलिंग पर जल-अक्षत अर्पित कर यंत्र स्थापित करें। मंत्र सूची और जाप 64 योगिनी मंत्रों का क्रमिक जाप 1-11 मालाएं प्रत्येक करें, प्रत्येक पर पुष्प-अक्षत अर्पण करें। मूल सूची (नित्यक्लिन्ना आदि से प्रारंभिक):ॐ काली नित्य सिद्धमाता स्वाहाॐ कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहाॐ कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा
...ॐ डाकिनी मदसालिनी स्वाहाॐ राकिनी पापराशिनी स्वाहा
...ॐ दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा पूर्ण संस्कृत रूप: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री [नाम] स्वाहा (उन्नत साधना में)। समापनआरती के बाद प्रसाद ग्रहण करें, चावल नदी में विसर्जित करें। हवन में प्रत्येक मंत्र से घी-आहुति दें (ॐ दिव्य योगाय नमः स्वाहा आदि चक्र मंत्र सहित)। गुरु रहित जाप विघ्नकारी; शुद्ध ब्रह्मचर्य पालन करें।
64 योगिनियों के प्रत्येक अलग मंत्र तांत्रिक ग्रंथों जैसे योगिनी तंत्र से लिए जाते हैं, मुख्यतः "ॐ [नाम] [विशेषण] स्वाहा" रूप में। ये मंत्र क्रमिक रूप से जपे जाते हैं, उन्नत रूप में "ॐ ऐं ह्रीं श्रीं [नाम] स्वाहा" जोड़ा जाता है।
## पूर्ण 64 मंत्र सूची
नीचे मानक सूची दी गई है (काली नित्यक्लिन्ना आदि से प्रारंभ):
1. ॐ काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा  
2. ॐ कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा  
3. ॐ कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा  
4. ॐ कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा  
5. ॐ विरोधिनी विलासिनी स्वाहा  
6. ॐ विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा  
7. ॐ उग्र रक्ता भोग रूपा स्वाहा  
8. ॐ उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा  
9. ॐ दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा  
10. ॐ नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा  
11. ॐ घना महा जगदम्बा स्वाहा  
12. ॐ बलाका काम सेविता स्वाहा  
13. ॐ मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा  
14. ॐ मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा  
15. ॐ मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा  
16. ॐ महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा  
17. ॐ कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा  
18. ॐ भगमालिनी तारिणी स्वाहा  
19. ॐ नित्यक्लिन्ना तंत्रार्पिता स्वाहा  
20. ॐ भेरुण्डा तत्त्व उत्तमा स्वाहा  
21. ॐ वह्निवासिनी शासिनी स्वाहा  
22. ॐ महावज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा  
23. ॐ शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा  
24. ॐ त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा  
25. ॐ कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा  
26. ॐ नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा  
27. ॐ नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा  
28. ॐ विजया देवी वसुदा स्वाहा  
29. ॐ सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा  
30. ॐ ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा  
31. ॐ चित्रा देवी रक्तपूजा स्वाहा  
32. ॐ ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा  
33. ॐ डाकिनी मदसालिनी स्वाहा  
34. ॐ राकिनी पापराशिनी स्वाहा  
35. ॐ लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा  
36. ॐ काकिनी नागनर्तकी स्वाहा  
37. ॐ शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा  
38. ॐ हाकिनी मनोहरिणी स्वाहा  
39. ॐ तारा योग रक्तापूर्णा स्वाहा  
40. ॐ षोडशी लतिका देवी स्वाहा  
41. ॐ भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा  
42. ॐ छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा  
43. ॐ भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा  
44. ॐ धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा  
45. ॐ बगलामुखी गुरुमूर्ति स्वाहा  
46. ॐ मातंगी कांटा युवती स्वाहा  
47. ॐ कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा  
48. ॐ प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा  
49. ॐ गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा  
50. ॐ मोहिनी माता योगिनी स्वाहा  
51. ॐ सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा  
52. ॐ अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा  
53. ॐ नारसिंही वामदेवी स्वाहा  
54. ॐ गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा  
55. ॐ अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा  
56. ॐ चामुंडा परिअंगनाथा स्वाहा  
57. ॐ वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा  
58. ॐ कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा  
59. ॐ इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा  
60. ॐ ब्रह्माणी आनन्दमूर्ति स्वाहा  
61. ॐ वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा  
62. ॐ माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा  
63. ॐ लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा  
64. ॐ दुर्गा सच्चिदानन्द स्वाहा 
## जाप निर्देश
प्रत्येक मंत्र 108 बार जपें, पुष्प अर्पित कर। सूचियां मंदिर परंपराओं (हिरापुर आदि) में थोड़ी भिन्न हो सकती हैं। गुरु दीक्षा अनिवार्य। 
64 योगिनी साधना में प्रत्येक योगिनी की दिशा
64 योगिनी साधना में प्रत्येक योगिनी की दिशा चक्राकार व्यवस्था पर आधारित होती है, जहां पूजा स्थल पर 8x8 ग्रिड (64 कोष्ठ) बनाकर चार मुख्य दिशाओं और कोनों में आठ-आठ योगिनियां स्थापित की जाती हैं। यह विन्यास तांत्रिक यंत्र या मंडल में पश्चिम से प्रारंभ कर पूर्व की ओर घूमता है। 
## दिशा-आधारित वर्गीकरण
64 योगिनियों को चार दिशाओं में बांटा जाता है, प्रत्येक दिशा में मुख्य योगिनी सहित आठ। उदाहरण (मानक चक्र क्रम से):
| दिशा | योगिनियां (1-8 उदाहरण) |
|------------|------------------------------------------------|
| पूर्व | काली नित्यक्लिन्ना, कपलिनी नागलक्ष्मी, कुला देवी, कुरुकुल्ला, विरोधिनी, विप्रचित्ता, उग्ररक्ता, उग्रप्रभा |
| दक्षिण | दीपमुक्तिः रक्तादेहा, नीलभुक्तिरक्तस्पर्शा, घनमहाजगदम्बा, बलाकाकामसेविता, मातृदेवी आत्मविद्या, मुद्रापूर्णा रजतकृपा  |
| पश्चिम | मितातंत्रकौलादीक्षा, महाकाली सिद्धेश्वरी, कामेश्वरी सर्वशक्ति, भगमालिनी तारिणी, नित्यक्लिन्ना तंत्रार्पिता  |
| उत्तर | भेरुण्डा तत्त्वोत्तमा, वह्निवासिनी शासिनी, महावज्रेश्वरी रक्तदेवी, शिवदूती आदि शक्ति  |
## स्थापना विधि
चक्र बनाकर गेहूं/जौ के ढेर पर प्रत्येक नाम जपते हुए अक्षत-पुष्प अर्पित करें। दिशा बंधन (ॐ सहस्रनाम दिशा बंधन) पूर्व से प्रारंभ। मंदिरों (हिरापुर, रणipur) में मूर्तियां इसी क्रम में हैं। गुरु निर्देशानुसार भिन्नता संभव। 
प्रत्येक दिशा की योगिनियों के यंत्र
64 योगिनी साधना में प्रत्येक दिशा की योगिनियों के लिए अलग-अलग यंत्र तांत्रिक ग्रंथों में वर्णित नहीं हैं, बल्कि एक समग्र **चौंसठ योगिनी महायंत्र** (8x8 चक्राकार यंत्र) का उपयोग होता है। इसमें चार मुख्य दिशाओं और कोनों में योगिनी-समूह स्थापित किए जाते हैं, प्रत्येक दिशा के 16 कोष्ठ (8 मुख्य + 8 सहायक योगिनी) यंत्र के भाग होते हैं। 
## महायंत्र संरचना
- **केंद्रीय भाग**: मां काली या त्रिपुरसुंदरी का बीज मंत्र (ॐ ऐं ह्रीं श्रीं)।
- **चार दिशाएं**: प्रत्येक दिशा में 16 त्रिकोण या वृत्त, नाम अंकित। भोजपत्र, तांबा या चांदी पर सूर्यास्त को दक्षिण/पश्चिम मुख बनाएं। 
## दिशा-वार यंत्र विशेषताएं
| दिशा | यंत्र रूप (आमंत्रण चक्र) | स्थापित योगिनियां (उदाहरण) |
|----------|-----------------------------------------|---------------------
| पूर्व | 8 त्रिकोणीय कोष्ठ, स्वर्ण रेखाएं | काली नित्यक्लिन्ना से उग्रप्रभा तक |
| दक्षिण | रक्त वर्ण कोण, अग्नि तत्व चक्र | दीपमुक्तिः से मुद्रापूर्णा तक |
| पश्चिम | तामसिक वृत्त, वायु तत्व | मितातंत्र से नित्यक्लिन्ना तक |
| उत्तर | श्वेत कोष्ठ, जल तत्व | भेरुण्डा से शिवदूती तक  |
## सिद्धि विधि
यंत्र पर प्रत्येक नाम जपते सिंदूर-चंदन से बिंदु लगाएं, फिर मूल मंत्र "ॐ ह्रीं सर्व योगिने स्वाहा" से हवन। गुरु दीक्षा अनिवार्य, अन्यथा विघ्न। मंदिर यंत्र (हिरापुर आदि) इसी आधार पर। 
प्रत्येक दिशा यंत्र सिद्धिकरण के मंत्र
64 योगिनी यंत्र सिद्धिकरण के लिए प्रत्येक दिशा का अलग मंत्र तांत्रिक ग्रंथों में दिशाबद्ध चक्र पूजन के रूप में वर्णित है। सामान्यतः सर्वप्रथम दश दिशा बंधन मंत्र से प्रारंभ कर दिशा-वार सिद्धि मंत्रों का जाप होता है, फिर चौंसठ योगिनी महायंत्र पर नाम जप। गुरु दीक्षा अनिवार्य। 
## दिशा बंधन मंत्र (पूर्व प्रक्रिया)
सभी दिशाओं को बांधने हेतु:  
**ॐ वज्र क्रोधाय महादन्ताय दश दिशों बंध बंध हूँ फट् स्वाहा**  
(अष्टगंध चावल छिड़कते 10 बार प्रत्येक दिशा में।) 
## दिशा-वार सिद्धिकरण मंत्र
चौंसठ महायंत्र के प्रत्येक दिशा खंड पर चंदन-सिंदूर से स्वास्तिक बनाकर 108 बार जपें:
| दिशा | सिद्धिकरण मंत्र (यंत्र स्थापना हेतु) | जाप संख्या |
|----------|------------------------------------------------|-----------|
| पूर्व | ॐ पूर्व दिशायै नमः ह्रीं काली नित्यक्लिन्ने स्वाहा  | 108 |
| दक्षिण | ॐ दक्षिण दिशायै नमः ह्रीं दीपमुक्तये रक्तदेहाये स्वाहा | 108 |
| पश्चिम | ॐ पश्चिम दिशायै नमः ह्रीं मितातंत्रकौलादिक्षायै स्वाहा | 108 |
| उत्तर | ॐ उत्तर दिशायै नमः ह्रीं भेरुण्डा तत्त्वोत्तमायै स्वाहा | 108 |## समग्र सिद्धि मंत्र
प्रत्येक दिशा पूजन के पश्चात महायंत्र के मध्य में:  
**ॐ परब्रह्म परमात्मने नमः उत्पत्ति स्थिति प्रलय कराय ब्रह्म हरीहराय त्रिगुणात्मने सर्वकौतुक दर्शय दत्तात्रेयाय नमः मंत्र तंत्र यंत्र सिद्धि कुरु कुरु स्वाहा** (108 बार)। 
हवन में प्रत्येक से 8 आहुतियां दें। शुद्ध ब्रह्मचर्य पालन कर रात्रि में करें। 
यंत्र सिद्धिकरण की साधना विधि और समय
64 योगिनी यंत्र सिद्धिकरण की साधना तांत्रिक परंपरा में गुरु दीक्षा के बाद की जाती है, जो चक्राकार महायंत्र को शक्ति संनाधान प्रदान करती है। यह 21 दिनों तक रात्रि में या 9 दिनों तक नवरात्रि में पूरी होती है। 
## शुभ समय
नवरात्रि, दीपावली, होली, अमावस्या, पुष्य/हस्त नक्षत्र, गुरुवार या ग्रहण काल। रात्रि 9-11 बजे पूर्व/पश्चिम मुख। 
## सिद्धिकरण विधि
1. स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें, स्थान पवित्र करें (गोमूत्र/गंगाजल)।
2. गणेश-गुरु पूजन, दश दिशा बंधन मंत्र: **ॐ वज्र क्रोधाय महादन्ताय दश दिशों बंध बंध हूँ फट् स्वाहा** (10 बार प्रत्येक दिशा)। 
3. यंत्र को पंचामृत स्नान कराएं, चंदन-सिंदूर स्वास्तिक बनाएं, प्रत्येक दिशा मंत्र से 108 जाप (पूर्व: ॐ पूर्व दिशायै... आदि)।
4. मूल मंत्र **ॐ ह्रीं सर्व योगिने स्वाहा** या **ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमः** 1008 बार, प्रत्येक योगिनी नाम जोड़कर। 
5. हवन: घी-हवन द्रव्य से प्रत्येक दिशा/नाम से 8 आहुतियां।
6. समापन: सप्ताहिक श्रीसूक्त पाठ, ब्राह्मण भोजन। 
यंत्र तिजोरी/पूजा गृह में रखें, गोपनीय रखें। ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य। 
यंत्र सिद्धि के बाद इसे कैसे सुरक्षित रखें
यंत्र सिद्धि के बाद चौंसठ योगिनी महायंत्र को सुरक्षित रखना शक्ति संरक्षण के लिए अनिवार्य है, अन्यथा ऊर्जा क्षीण हो सकती है। इसे लाल कपड़े में लपेटकर तिजोरी या पूजा गृह के उत्तर-पूर्व कोने में स्थापित करें। 
## रखरखाव विधि
- **स्थान**: स्वच्छ, शांत पूजा स्थल पर लकड़ी के आसन पर रखें; रसोई/शौचालय से दूर। लाल वस्त्र/सूत्र से ढकें। 
- **दैनिक पूजन**: प्रातः/संध्या धूप-दीप दिखाएं, चंदन-सिंदूर तिलक लगाएं। मूल मंत्र **ॐ ह्रीं सर्व योगिने स्वाहा** 11 बार जपें।  **साप्ताहिक अभिषेक**: पंचामृत/गंगाजल से स्नान कराएं, श्रीसूक्त पाठ करें। 
- **प्रतिदिन दर्शन**: अपलक दृष्टि से 5 मिनट देखें, शक्ति संचार होता है। 
## सावधानियां
- गंदे हाथों से न स्पर्शें; रजस्वला अवस्था में दूर रखें।
- क्षतिग्रस्त होने पर नदी में विसर्जित कर नया सिद्ध करें। गोपनीय रखें। 
- ब्रह्मचर्य पालन रखें, अन्यथा शापित। 
यंत्र सिद्धि टूटने पर क्या करें
यंत्र सिद्धि टूटने पर तत्काल प्रायश्चित्त अनिवार्य है, क्योंकि खंडित यंत्र शक्ति क्षीण कर विघ्न उत्पन्न करता है। चौंसठ योगिनी महायंत्र टूटने पर नदी/तीर्थ में विसर्जन कर नया यंत्र सिद्ध करें। 
## प्रायश्चित्त विधि
- **उपवास**: एक दिन (सोमवार/अमावस्या) फलाहार रखें। 
- **मंत्र जाप**: इष्ट मंत्र या मूल मंत्र **ॐ ह्रीं सर्व योगिने स्वाहा** (या ॐ नमः शिवाय) 1 लाख/10,000 बार जपें। 
- **हवन**: जाप का 10% आहुतियां (दशांश) घी-हवन द्रव्य से दें। 
- **भोजन**: ब्राह्मणों को भोजन दान कर समापन। 
## विसर्जन प्रक्रिया
लाल कपड़े में लपेटकर गंगा/यमुना जैसी पवित्र नदी में प्रवाहित करें। भाव से क्षमा मांगें। 
## नया यंत्र स्थापना
प्रायश्चित्त के 3-7 दिन बाद शुभ मुहूर्त में नया यंत्र सिद्ध कर पूर्व विधि से स्थापित करें। खंडित यंत्र घर में न रखें, अन्यथा कष्ट बढ़ते हैं। प्रायश्चित जप के लिए कौन सा मंत्र जपें
यंत्र सिद्धि टूटने के प्रायश्चित्त जाप के लिए तांत्रिक परंपरा में चौंसठ योगिनी महायंत्र से जुड़े मूल मंत्रों का प्रयोग करें। ये मंत्र शक्ति क्षमा और पुनर्स्थापना के लिए शास्त्रीय हैं। 
## मुख्य प्रायश्चित्त मंत्र
- **मूल योगिनी मंत्र**: ॐ ह्रीं सर्व योगिने स्वाहा (या ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्व योगिनी स्वाहा)। 10,000 से 1 लाख जाप। 
- **शिव प्रायश्चित्त**: ॐ नमः शिवाय (महामृत्युंजय सहित)। सभी तांत्रिक दोष नाश हेतु। 
- **काली मंत्र**: ॐ क्रीं कालीकायै नमः। यंत्र शक्ति पुनर्जीवन के लिए।
## जाप विधि
सोमवार/अमावस्या को पूर्व मुख बैठकर 108 माला पूरी करें। प्रत्येक माला के बाद क्षमा प्रार्थना: "हे मातृशक्तयो अनुगृह्यताम्"। हवन दशांश (10%) आहुतियां दें। 
## वैकल्पिक महामंत्र
**ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥**  
(विष्णु प्रायश्चित्त, 108 बार)। 
प्रायश्चित्त समापन पर ब्राह्मण दान कर नया यंत्र सिद्ध करें। शुद्ध भाव अनिवार्य। 


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