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Ganesha (Ashtavinayaka) Forms of Ganpati & Sadhana Procedure

​ Ganpati (Ganesha) is worshipped in many distinct forms across Hindu tradition, broadly grouped into: the 32 classical iconographic forms used for home and temple installation, the eight self‑manifest (svayambhu) Ashtavinayaka forms of Maharashtra, and a few special ritual/material forms like Shwetark Ganpati.  Use the universal Ganesha bija mantra **ॐ गं गणपतये नमः** (*Om Gam Ganapataye Namah*) for any form if a specific mantra is not available; for the 32 forms, many traditions also use **ॐ श्रीं गं क्लीं ग्लौं गणपतये वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा** as a general 32‑form mantra. # Form (Sanskrit/Hindi) Mantra (Devanagari) Transliteration Core purpose 1 Bala Ganapati ॐ बाल गणपतये नमः Om Bala Ganapataye Namah Children, new beginnings, protection of kids. 2 Taruna Ganapati ॐ तरुण गणपतये नमः Om Taruna Ganapataye Namah Youthful energy, career start, competitions. 3 Bhakti Ganapati ॐ भक्ति गणपतये नमः Om Bhakti Ganapataye Namah Devotion, grace, daily upa...

डाकिनी साधना: रहस्य और विधान, | भूतनी साधना: रहस्य और विस्तृत विधान

डाकिनी साधना: रहस्य और विधान डाकिनी साधना तंत्र जगत की एक अत्यंत शक्तिशाली और उग्र साधना है। डाकिनी को अक्सर माँ काली की सहायक शक्तियों के रूप में जाना जाता है। इनकी साधना मुख्य रूप से शत्रुओं के समूल नाश, भूत-भविष्य की गुप्त जानकारी प्राप्त करने और असाध्य भौतिक कार्यों को सिद्ध करने के लिए की जाती है। डाकिनी साधना जितनी जल्दी सिद्ध होती है, उतनी ही यह साहसी और दृढ़ संकल्प वाले साधकों के लिए उचित मानी गई है। यह साधना साधक को एक विशेष प्रकार की निर्भयता और वर्चस्व प्रदान करती है। सावधानी: यह एक अत्यंत उग्र साधना है। इसे केवल एक अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। गुरु न होने पर भगवान शिव (महाकाल) को गुरु मानकर ही प्रारंभ करें। 1. आवश्यक सामग्री डाकिनी यंत्र (ताम्र या भोजपत्र पर निर्मित)। काले हकीक की माला। रक्षा माला (साधना के समय गले में अनिवार्य)। काले रंग का आसन और पहनने के लिए काले वस्त्र। शुद्ध सरसों के तेल का चौमुखी दीपक। काले तिल, उड़द, और लोबान की धूप। लाल पुष्प और मदिरा (भोग हेतु)। (नोट: यन्त्र , माला , रक्षा माला , गुटिका मंत्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठित होनी चाहिए।) 2. साध...

नाभिदर्शना अप्सरा साधना

नाभिदर्शना अप्सरा साधना नाभिदर्शना अप्सरा की साधना सौंदर्य, यौवन और भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए की जाने वाली एक उच्च कोटि की साधना है। इस अप्सरा की काली और लम्बी आंखें, लहराते हुए झरने की तरह केश और चन्द्रमा की तरह मुस्कुराता हुआ चेहरा, कमल नाल की तरह लम्बी बांहें और सुन्दरता से लिपटा हुआ पूरा शरीर एक अजीब सी मादकता बिखेर देता है, और इन्हें इन्द्र का वरदान प्राप्त है, कि जो इसके सम्पर्क में आता है, वह पुरुष पूर्ण रूप से रोगों से मुक्त होकर चिर यौवनमय बन जाता है, उनके शरीर का कायाकल्प हो जाता है, और पौरुष की दृष्टि से वह अत्यन्त प्रभावशाली बन जाता है। अप्सरा साधनाओं में इन्हें अत्यंत सौम्य और शीघ्र प्रसन्न होने वाली माना गया है। इस साधना को स्त्रियां भी सिद्ध कर सकती हैं, नाभि दर्शना अप्सरा के रूप में उन्हें अभिन्न सखी प्राप्त हो जाती है, और उस सखी के साहचर्य से साधिका के शरीर का भी कायाकल्प हो जाता है, और ऐसी साधिका अत्यन्त सुन्दर, यौवनमय और सम्मोहक बन जाती हैं। वास्तव में ही यह साधना बालक या वृद्ध किसी भी वर्ण या जाति का व्यक्ति या स्त्री सम्पन्न कर सकते हैं, और यदि विश्‍वास एवं श्...

श्रीदेवीखड्गमालास्तोत्ररत्नम्

पाठार्थं शुद्धदेवनागरीपत्रम् सिद्धम् — देवनागरी एव, न कापि रोमाक्षरी न चाङ्ग्लभाषा। रचना • क्रमः — विनियोगात् आरभ्य अङ्गदेवताः, तिथिनित्याः, त्रिविधं गुरुमण्डलम्, ततः नव आवरणानि संहारक्रमेण, अन्ते नवचक्रेश्वरीनामानि, श्रीदेवीविशेषणानि, नमस्कारः, वामकेश्वरतन्त्रकोलोफनः। • प्रत्येकावरणे शीर्षके आवरणनाम, तदधः आवरणविद्या, मुद्रा, बीजम् — ततः नामावली सन्धियुक्तपङ्क्तिरूपेण पाठसौकर्यार्थम्, अन्ते चक्रस्वामिनी-योगिनीयुग्मम् गाढाक्षरैः। • नामसंख्या देवनागर्यङ्कैः (६, १६, १९, १०, ८, १४…) — जपगणनार्थम्। • पाठान्तराणि — गरिमासिद्धे कोष्ठके स्थापिता, नवमावरणयोगिन्याः द्वौ पाठौ अन्तटिप्पण्यां निर्दिष्टौ। जागरूकतार्थं मूलविद्या (षोडशी) न लिखिता — सा गुरुमुखादेव ग्राह्या। ध्यानश्लोकः अपि न निवेशितः, यतः तस्य पूर्णपाठः सत्यापितुं न शक्तः — इच्छायां पृथक् योजयितुं शक्नोमि। आवरणविद्याः बीजानि च पूजापद्धतितः, न खड्गमालायाः अङ्गम् — केवलं खड्गमालापाठं वाञ्छन् चेत् ताः पङ्क्तीः अपसारयितुं शक्नोमि। ​ श्रीदेवीखड्गमालास्तोत्ररत्नम् — नवावरणपाठः विनियोगः ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ॐ नमस्त्रिपुरसुन्द...

सुर-सुंदरी योगिनी साधना

सुर-सुंदरी योगिनी साधना "सुर-सुंदरी" का अर्थ है "देवताओं में भी सबसे सुंदर"। यह आठ प्रमुख योगिनियों में से एक हैं और इन्हें अद्वितीय सौंदर्य, आकर्षण, कला और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इनकी साधना साधक को एक अलौकिक और चुंबकीय व्यक्तित्व प्रदान करती है, जिससे वह जगत को मोहित करने में सक्षम हो जाता है। यह स्वभाव से अत्यंत सौम्य, दयालु और साधक के प्रति पूर्ण समर्पित होती हैं। सावधानी: यह साधना अत्यंत प्रभावशाली है, इसलिए इसे पूर्ण विश्वास और गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। गुरु न होने पर भगवान शिव को अपना गुरु मानकर साधना शुरू करें। 1. आवश्यक सामग्री सुर-सुंदरी योगिनी यंत्र (ताम्र या स्वर्ण पत्र पर निर्मित)। स्फटिक की माला (या लाल चंदन की माला)। रक्षा माला (साधना के समय गले में धारण करें)। गुलाबी या सफेद रंग का आसन और पहनने के लिए गुलाबी/सफेद वस्त्र। शुद्ध केसर, सफेद चंदन और गुलाब के फूल। गुलाब का इत्र और सुगंधित अगरबत्ती। शुद्ध घी का दीपक। (नोट: यन्त्र , माला , रक्षा माला मंत्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठित होनी चाहिए।) 2. साधना विधान साधक किसी भी शुक्रवा...

चौंसठ योगिनियाँ - एक रहस्यकौन हैं चौंसठ योगिनियाँ?

चौंसठ योगिनियाँ - एक रहस्य कौन हैं चौंसठ योगिनियाँ? योगिनी परिचय भारतीय तंत्र और अध्यात्म की रहस्यमयी दुनिया में योगिनियों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली है। आम धारणा के विपरीत, योगिनियाँ केवल योग का अभ्यास करने वाली सामान्य स्त्रियाँ नहीं हैं, बल्कि वे अलौकिक शक्तियों से संपन्न दिव्य स्त्री-शक्तियाँ हैं। कौन हैं योगिनियाँ? योगिनियों को आदिशक्ति, देवी पार्वती या दुर्गा की सहचरी या उनके ही विभिन्न ऊर्जा-रूप माना जाता है। वे प्रकृति की गुप्त शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं और सिद्धियों की स्वामिनी होती हैं। उनका स्वभाव दोहरा होता है - एक ओर वे अपने साधक पर प्रसन्न होकर उसे अष्ट-सिद्धियाँ और समस्त भौतिक-आध्यात्मिक सुख प्रदान करती हैं, तो दूसरी ओर, साधना में त्रुटि होने पर वे अत्यंत उग्र और विनाशकारी भी हो सकती हैं। चौंसठ योगिनियाँ तंत्र ग्रंथों में मुख्य रूप से चौंसठ योगिनियों (Chausath Yogini) के समूह का वर्णन मिलता है। यह समूह अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है और इनकी सामूहिक साधना बहुत दुर्लभ होती है। प्रत्येक योगिनी का अपना एक विशिष्ट नाम, स्वरूप, वाहन, गुण और शक्तियाँ होती हैं...

कनकावती योगिनी साधना

कनकावती योगिनी साधना "कनकावती" का अर्थ है "स्वर्ण से युक्त" या "स्वर्णमयी"। यह आठ प्रमुख योगिनियों में से एक हैं और इन्हें धन, स्वर्ण, रत्न और असीम भौतिक ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इनकी साधना दरिद्रता का समूल नाश कर साधक के जीवन में सुख-समृद्धि के द्वार खोल देती है। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य, स्वर्ण के समान चमकता हुआ और ममतामयी होता है। यह अपने साधक पर अति शीघ्र प्रसन्न होकर उसे धनवान और सुखी बना देती हैं। सावधानी: यह साधना अत्यंत प्रभावशाली और तीव्र है, इसलिए इसे पूर्ण पवित्रता और गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। गुरु न होने पर भगवान शिव को अपना गुरु मानकर साधना प्रारंभ करें। 1. आवश्यक सामग्री कनकावती योगिनी यंत्र (ताम्र या स्वर्ण पत्र पर निर्मित)। स्फटिक या हकीक माला (मंत्र जाप के लिए) रक्षा माला (साधना के समय गले में धारण करने के लिए)। पीले रंग का आसन और पहनने के लिए पीले वस्त्र। शुद्ध केसर, कुमकुम और पीले पुष्प (गेंदा या स्वर्ण चम्पा)। शुद्ध घी का दीपक और सुगंधित अगरबत्ती। कच्चा दूध, गंगाजल और शहद। (नोट: यन्त्र , माला , रक्षा माला मं...