कृत्या‑साधना मंत्र
कृत्या‑साधना एक तांत्रिक शक्ति‑साधना है जिसमें शिव की एक अत्यंत तीव्र विनाशकारी शक्ति “कृत्या” को जागृत कर मारण, शत्रुनाश, रक्षा या अन्य आध्यात्मिक कार्यों के लिए उपयोग किया जाता है। यह साधना आमतौर पर गुरु‑दीक्षा और विशेष अनुष्ठान के बिना सीधे नहीं की जाती, क्योंकि इसकी शक्ति इतनी सीधी और भारी मानी गई है कि गलत या अनुचित उपयोग से फल प्रतिकूल या घातक हो सकता है।
### कृत्या क्या है?
कुछ सम्प्रदायों के अनुसार कृत्या शिव की एक विशिष्ट उद्रेक‑शक्ति है, जो किसी भी वस्तु या व्यक्ति को बहुत कम समय में नष्ट कर सकती है; इसे “प्रेरण‑शक्ति” या मारण‑विद्या के रूप में भी बताया जाता है। कुछ गुरुपरम्पराओं में कृत्या को देवी/देवता की तरह नहीं, बल्कि एक “मानसिक शक्ति‑रूपी” या “मारण‑प्रेत‑सदृश” उर्जा के रूप में देखा जाता है, जिसका रूप दार या देवी के रूप में भी लेपिट कर लिया जा सकता है।
### साधना की प्रकृति
कृत्या‑साधना को आमतौर पर एक मारण या “शत्रुनाशक” प्रयोग के रूप में देखा जाता है, और इसे अधिकांश गुरुओं के अनुसार केवल विशेष परिस्थितियों, अत्यंत आवश्यकता तथा गहन ध्यान, दीक्षा और रक्षा‑मंत्र के साथ ही करने की सलाह दी जाती है। कई गुरु इसे इतना तीव्र बताते हैं कि वैष्णव, हनुमान‑साधक या बहुत ऊँची शक्ति‑साधकों पर इसका प्रयोग “वापसी या प्रतिघात” का कारण बन सकता है, इसलिए इन पर अक्सर इसका प्रयोग मना ही समझा जाता है। कुछ सामान्य विधि‑संकेत (सिद्ध‑परम्परा के अनुसार)
विभिन्न गुरुपरम्पराओं में कृत्या‑साधना की विधि में फर्क है, पर कुछ बातें आमतौर पर समान हैं:
दीक्षा और गुरु‑आज्ञा: अधिकांश स्रोत यह स्पष्ट करते हैं कि बिना गुरुदीक्षा के “सीधा” कृत्या‑साधना नहीं करनी चाहिए; दीक्षा के बाद ही विशेष मंत्र, विधि और साधन‑सामग्री दी जाती है।
- समय और स्थान: कई गुरु आदेश रात्रि के समय (लगभग 10 बजे के बाद), अक्सर श्मशान या तन्त्र‑स्थान पर साधना करने की मान्यता देते हैं, क्योंकि कृत्या को “श्मशान‑शक्ति” या विनाशक शक्ति माना जाता है।
- आचरण‑नियम: ब्रह्मचर्य, शुद्ध खान‑पान, अनिवार्य रूप से निरंतर रक्षा‑मंत्र, और कभी‑कभी व्रत या अनुष्ठान किये जाने की बात कही जाती है।
कुछ गुरुपरम्पराओं में 11 दिन की लघु‑साधना भी बतायी जाती है, जिसमें निर्दिष्ट मंत्र की 1 माला रात को शुद्ध अवस्था में जाप कर साधक देवी कृत्या की “दिव्य कृपा” या सिद्धि प्राप्त करने की दिशा दिखाई जाती है।
### सावधानियाँ और चेतावनी
कई अनुभवी तांत्रिक लिखते या कहते हैं कि कृत्या‑साधना “मारण” के लिए बहुत अधिक शक्तिशाली है, इसलिए इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और केवल उन्हीं के लिए उपयुक्त है जो लंबे अनुभव, नियमित शुद्ध जीवन और गुरुनिष्ठा के साथ साधना करते आए हों।
- अनेक गुरु यह भी दृढ़ता से चेतावनी देते हैं कि बिना पूर्ण ज्ञान, दीक्षा और उचित रक्षा‑व्यवस्था के कृत्या‑प्रयोग करने पर प्रतिघात न केवल शत्रु पर, बल्कि साधक‑परिवार या आत्मा पर भी पड़ सकता है।
### आपके लिए व्यावहारिक सुझाव (साधक के रूप में)
- यदि आप वास्तव में कृत्या‑साधना में रुचि रखते हैं, तो पहले गुरु या विश्वसनीय तांत्रिक परम्परा से दीक्षा और विस्तृत विधि लेना अनिवार्य है !
- कृत्या को अधिकतम रूप से “रक्षा‑शक्ति” या “अत्यंत सीमित आवश्यकता के लिए शत्रु‑निरोध” के रूप में ही लेना चाहिए, न कि नित्य‑प्रयोग या हल्के मन से।
“ध्यान‑मंत्र” है जिसके द्वारा साधक शिव से उत्पन्न तीव्र विनाशकारी शक्ति कृत्या का अंतःचक्षु से ध्यान करता है और उसकी ऊर्जा को अपने भीतर सक्रिय करने का अभ्यास करता है। यह मंत्र एक “प्रतीकात्मक दृष्टि” (symbolic view) के रूप में माना जाता है, जो उस अनिर्वचनीय, अत्यंत तीक्ष्ण शक्ति को ध्वनियों के रूप में बाँधता है, जिसे कृत्या कहा जाता है।
### Kritya Dhyan Mantra का रूप (संस्कृत/ध्वनि‑स्वरूप)
एक ज्ञात परम्परा (गुरुदेव नारायण दत्त शर्मली कृत) के अनुसार Kritya Dhyan Mantra इस प्रकार दिया जाता है:
> **“धूंकार रूपं धं धं धनेधां क्लीं क्लीं ह्लीं वां हलवं हलैव
प्रां प्रूं पदे पूर्व सदैव कृत्यां क्रां क्रीं कृते कुर्व कदैव कृत्यां”**
>
> या रोमन लिपि में:
> **“Dhunkar Rupam Dham Dham Dhanedham Kleem Kleem Hleemvram Halvam Halev Praam Proomm Pade Poorva Sadev Krityam Kraam Kreem Krite Kurv Kadev Krityam”**
यह मंत्र ध्यान के रूप में पढ़कर या मन में जपकर उस “धूंकार‑जैसी”, आग और विनाशकारी शक्ति की कल्पना की जाती है, जो क्षण में वस्तु को भस्म कर सकती है।
इस मंत्र की आध्यात्मिक स्थिति
- कई आधुनिक गुरुपरम्पराओं में यह मंत्र “प्री‑वैदिक” या गुरुकृपा से प्राप्त माना जाता है, यानी यह सामान्य ग्रंथ‑मंत्र से बाहर की ओर से दिया गया विशेष ध्यान‑मंत्र है।
- कृत्या को शिव की एक “अनिवार्य और तीखी” ऊर्जा बताया जाता है, जो वस्तुतः न पुरुष‑रूप और न स्त्री‑रूप में सीमित है, बल्कि साधक के ध्यान और इच्छा के अनुसार रूप ग्रहण कर सकती है।
ध्यान और जाप की परम्परागत विधि‑संकेत
- यह ध्यान‑मंत्र आमतौर पर **रात्रि के समय** (लगभग 10 बजे के बाद), माला से **1 माला** जाप के रूप में 11 दिन तक लगातार किया जाता है, जिससे देवी कृत्या की “दिव्य कृपा” या सिद्धि के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
- गुरुपरम्परा में इसके साथ **गुरु‑पूजा**, शुद्ध वस्त्र (पीला/सफेद बिना सिले), उचित माला (रुद्राक्ष, हकीक या “सर्प‑अस्थि”‑माला, जो पहले से कृत्या‑संस्कार युक्त हो), 9 दीपक और ब्रह्मचर्य जैसे नियम भी बताये गये हैं।
महत्वपूर्ण चेतावनी
- यह मंत्र और ध्यान अत्यंत तीव्र शक्ति से सम्बंधित है, इसलिए अधिकांश गुरु इसे **केवल दीक्षित साधकों** के लिए ही उपयुक्त बताते हैं; न केवल मंत्र, बल्कि विधि और रक्षा‑मंत्र‑संस्कार के बिना इसका स्वतंत्र प्रयोग जोखिम भरा माना जाता है।
यदि चाहें तो आप यह बता सकते हैं कि आपका उद्देश्य क्या है (जैसे रक्षा, शत्रु‑नियंत्रण, या शुद्ध तांत्रिक शक्ति के लिए) ताकि इस ध्यान‑मंत्र के साथ सुरक्षित रक्षा‑मंत्र या वैकल्पिक ध्यान‑विधियाँ भी सुझा सकूँ।
Kritya Dhyan Mantra
Kritya Dhyan Mantra का “पूरा मंत्र” एक ध्यान‑प्रकृति वाला विशेष शब्द‑समूह है, जिसे गुरुदेव नारायण दत्त शर्मली द्वारा **प्री‑वैदिक / गुरु‑प्रकट मंत्र** के रूप में दिया गया माना जाता है। इसका संस्कृत/ध्वनि‑स्वरूप नीचे दिया गया है (साधारण लिपि और रोमन दोनों में):
Kritya Dhyan Mantra – पूरा मंत्र
**हिंदी‑लिपि में:**
> **“धूंकार रूपं धं धं धनेधां क्लीं क्लीं ह्लीं वां हलवं हलैव
प्रां प्रूं पदे पूर्व सदैव कृत्यां क्रां क्रीं कृते कुर्व कदैव कृत्यां”**
**रोमन लिपि में:**
> **“Dhunkar Rupam Dham Dham Dhanedham Kleem Kleem Hleemvram Halvam Halev Praam Proomm Pade Poorva Sadev Krityam Kraam Kreem Krite Kurv Kadev Krityam”**
इस मंत्र का स्वरूप और उपयोग
- यह मंत्र **कृत्या शक्ति के ध्यान** के लिए माना जाता है, जो शिव की एक अति तीव्र, विनाशकारी ऊर्जा है, जो क्षण भर में किसी वस्तु को भस्म कर सकती है।
- परम्परा में इसे आमतौर पर **रात के समय** (लगभग 10 बजे के बाद), **1 माला** जाप के रूप में 11 दिन तक नियमित रूप से जपा जाता है, ताकि देवी कृत्या की दिव्य कृपा या सिद्धि प्राप्त हो सके।
### सावधानी और चेतावनी
- यह मंत्र और ध्यान‑विधि अत्यंत तीव्र शक्ति से जुड़ी है, इसलिए अधिकांश गुरु इसे **केवल दीक्षित साधकों** के लिए ही उपयुक्त बताते हैं; बिना गुरु‑दीक्षा, रक्षा‑मंत्र‑संस्कार और नियमित व्रत‑ब्रह्मचर्य के साथ अकेले इसका प्रयोग करना जोखिम भरा माना जाता है।
Kritya Dhyan Mantra की साधना विधि
Kritya Dhyan Mantra की साधना विधि एक अत्यंत तीव्र और गुप्त‑प्रकृति वाली तांत्रिक विधि है, जिसे ज्यादातर नारायण दत्त शर्मली जैसे सम्प्रदायों में **11‑दिवसीय लघु‑साधना** के रूप में बताया गया है। यहाँ उसी परम्परा के अनुसार साधना विधि का संक्षिप्त और सुरक्षित‑तरीके से समझाया गया रूप दिया जा रहा है (पूर्ण गुरु‑परम्परा के अनुसार ही अनुभव करने की सलाह दी जाती है)।
1. साधना का समय और दिशा
- साधना **केवल रात में**, आमतौर पर **रात 10 बजे के बाद** की जाती है; दिन में नहीं करने की बात बताई गई है।
- अधिकांश शिव‑कृत्या‑परम्पराओं में **दक्षिण दिशा** की ओर मुँह करके बैठने की विधि दी जाती है, क्योंकि कृत्या को दक्षिण‑प्रधान विनाशक शक्ति माना जाता है।
2. वस्त्र, आसन और ब्रह्मचर्य
- वस्त्र: कई गुरु **पीले या सफेद बिना सिले कपड़े** पहनकर साधना करने की मान्यता देते हैं; कुछ अन्य या अलग सम्प्रदाय काले वस्त्र भी निर्देशित करते हैं, जो गुरु‑सम्प्रदाय पर निर्भर है।
- आसन: आसन या आधार‑कपड़ा भी साफ और शुद्ध रखने की बात बताई जाती है; अधिक तीक्ष्ण विधियों में **काले रंग का आसन/धोती** भी दिखाया जाता है।
- ब्रह्मचर्य: साधना के पूरे काल **ब्रह्मचर्य** (व्रत‑नियम और इंद्रिय‑संयम) का पालन करना आवश्यक माना जाता है।
3. दीपक, माला और मंत्र‑जाप
- दीपक: अक्सर **9 दीपक** तिल या सरसों के तेल से जलाने की विधि बताई जाती है, क्योंकि यह तेल तीव्र तांत्रिक शक्ति के लिए उपयुक्त माना जाता है।
- माला: मंत्र का जाप आमतौर पर **काली हकीक माला, रुद्राक्ष माला** या **सर्प‑अस्थि माला** से किया जाता है, जो पहले से **कृत्या माला‑संस्कार** से शक्ति‑प्राप्त और उपयोग‑मुक्त (अप्रयुक्त) होनी चाहिए।
- जाप‑विधि:
- प्रतिदिन **रात को 1 माला** Kritya Dhyan Mantra का जाप करना।
- अधिक तीव्र या लंबी सिद्धि के लिए कुछ सम्प्रदाय 11 दिनों में **11 माला** या उससे अधिक जाप की विधि बताते हैं, लेकिन यह गुरु‑निर्देश पर निर्भर है।
4. गुरु‑पूजा और रक्षा‑क्रम
- आरंभ में **गुरु‑पूजा** और **गुरु‑मंत्र की 1 माला** जाप करने की निर्देश‑विधि बताई जाती है, ताकि कृत्या‑शक्ति का फल नियंत्रण‑में रहे।
- कुछ विधियों में **देह‑रक्षा मंत्र**, **कवच‑रक्षा** या **दिशा‑बंधन मंत्र** (जैसे ॐ ऐं क्लीं ह्रीं क्रीं ॐ फट् आदि) का भी जाप साधना से पहले करने की व्यवस्था दी जाती है, ताकि शक्ति का उलटा प्रतिघात न हो।
5. 11‑दिवसीय साधना‑चक्र
- इस विधि में आमतौर पर:
- **11 दिनों तक निरंतर रात्रि‑जाप**,
- **प्रतिदिन 1 माला**,
- **कड़ाई से ब्रह्मचर्य, शुद्ध आहार, दीपक‑माला‑नियम**,
- अंत में **कृत्या की दिव्य कृपा या सिद्धि की अनुभूति** के लिए संकल्प रखने की बात बताई जाती है।
6. महत्वपूर्ण चेतावनी
- यह विधि अत्यंत तीव्र शक्ति से जुड़ी है, इसलिए अधिकांश गुरु **बिना गुरु‑दीक्षा और माला‑संस्कार के** इसे अकेले अनुष्ठान न करने की सलाह देते हैं, नहीं तो शक्ति अनुप्रबंधित रूप से काम कर सकती है।
- यदि आपका उद्देश्य शुद्ध रक्षा या सत्य‑अनुसंधान है, तो आपके लिए कृत्या‑से कम तीव्र रक्षा‑मंत्र‑विधियाँ (जैसे काली / हनुमान / नारसिंह रक्षा‑कवच) अधिक सुरक्षित और उपयुक्त रहती हैं।
कृत्या के 64 प्रकारों के पूरे, विस्तृत नामों की सूची आम सार्वजनिक ग्रंथों और वेब‑स्रोतों में खुलकर नहीं दी गई है; इसलिए उनकी पूरी रूप‑रेखा बताना भी संभव नहीं। जो भी जानकारी मिलती है, वह आम तौर पर केवल कुछ नामों और उनके स्वरूप‑वर्णन तक ही सीमित रहती है।
1. “64 कृत्या” सिर्फ संख्या है, नाम‑सूची गुप्त रखी गई है
- कृत्या 64 प्रकार की होती है, और संहारिणी कृत्या सबसे उग्र और विनाशकारी होती है।
- इनके नाम आम तौर पर गुरु‑परंपरा में मुखागम‑रूप से दिए जाते हैं, सार्वजनिक ग्रंथों में पूरी लिस्ट उपलब्ध नहीं है।
2. कुछ ज्ञात‑नाम या वर्ग‑प्रकार (उदाहरण‑स्वरूप)
अलग‑अलग तंत्र‑लेखों और व्याख्याओं में निम्नलिखित नाम या प्रकारों का उल्लेख मिलता है; ये 64 में से कुछ ही हैं, पूरी लिस्ट नहीं:
- संहारिणी कृत्या– सबसे उग्र, मारण‑शक्ति वाली, कापालिक‑साधना में विशेष रूप से जागृत की जाती है।
- **कालाग्नि कृत्या** – शिव/महाकाल से उत्पन्न मानी जाती है, अग्नि‑सदृश विनाशकारी शक्ति।
- **बिद्रुणी कृत्या** – दुर्वासा‑यज्ञ से उत्पन्न कथित कृत्या, शत्रु‑विद्रोह और विध्वंस‑प्रधान।
- **मोहिनीकृत्या** – मोह‑मारण‑कार्यों से जुड़ी, जिसका उल्लेख कृष्ण‑मोहिनी कथाओं के संदर्भ में भी मिलता है।
- **अष्ट‑कृत्याएँ** (डाक, शाक, लाँक, रात, हांक, विधुती, क्रोधनी, जिह्वा) – जिन्हें कांतलौह दैत्य ने उत्पन्न किया बताया जाता है।
3. विभाजन‑तर्क (कार्य‑आधार पर)
कई आधुनिक आचार्यों के अनुसार 64 कृत्याओं का वर्गीकरण **क्रिया‑कार्य** के आधार पर होता है, जैसे:
- **मारण‑कृत्या** (शत्रु‑वध, रोग‑उत्पादन)
- **मोहन‑कृत्या** (मन को वश, आकर्षण, भ्रम)
- **स्तंभन‑कृत्या** (गतिहीन, चेतना‑रोक)
- **उच्चाटन‑कृत्या** (व्यक्ति को स्थान से बाहर, विस्थापन)
- **विद्वेष‑कृत्या** (द्वेष, झगड़ा, परिवार‑विभाजन)
- **रक्षा‑कृत्या** (बाधा‑रोध, अभिचार‑तोड़, शत्रु‑शक्ति‑निरसन)
ये वर्ग आम तौर पर सिद्ध‑कृत्या‑साधकों के अनुभव‑वर्णनों से निकाले गए हैं, किसी एक पूर्ण ग्रंथ में नामों के साथ दर्ज नहीं।
1. **गुप्त विद्या‑स्वरूप**
- अधिकांश तांत्रिक मानते हैं कि **कृत्या‑विद्या विशेष रूप से गुप्त और दीक्षा‑आधारित** है; इसलिए नाम‑सूची खुले रूप से नहीं दी जाती, क्योंकि यह “शस्त्र”‑सा चीज है।
2. **कर्म‑प्रतिबंध‑कारण**
- यदि ये नाम सार्वजनिक रूप से लिखे जाएँ, तो **किसी भी व्यक्ति द्वारा दुरुपयोग** की आशंका रहती है, इसलिए गुरु‑परंपरा इसे मुखागम ही रखती है।
कृत्या‑मारण / शत्रु‑नाश शैली के अंश‑मंत्र
कई तंत्र‑व्याख्याओं में निम्न‑प्रकार के मंत्र‑अनुभव‑वाक्य दिखते हैं (ध्यान रहे, ये गुप्त‑पूर्ण‑मंत्र नहीं, बल्कि उदाहरण‑स्वरूप हैं):
ॐ कृत्या सर्व शत्रुणाँ मारय मारय हन हन ज्वालय ज्वालय जय जय साधक प्रिये ॐ स्वाहा॥
ॐ क्लीम क्लीम शत्रुणाम मोहये उच्चाटाये मारये वचन सिद्धि मम आज्ञा पालय पालय कृत्याम सिद्धि फट।।
ये वाक्य तंत्र‑साधना‑विवरणों में उद्धरण‑रूप में आते हैं, लेकिन इन्हें अकेले ही “संहारिणी का मूल‑मंत्र” कहना ठीक नहीं; ये विधि‑संदर्भ के बिना अर्थ‑शून्य या खतरनाक रूप में बन सकते हैं।
कृत्या‑रक्षा‑मंत्र देती हैं, जो शत्रु या अभिचार से बचाव के लिए बताए जाते हैं, संहारिणी‑मूल‑मंत्र के रूप में नहीं:
ॐ ह्रीं क्लीं शत्रु उच्चाटय मम् आज्ञा पालय कृत्यां सिद्धी ह्रीं फट् स्वाहा॥
ऐसे मंत्र आमतौर पर रक्षा और उच्चाटन‑प्रधान उपयोग के लिए बताए जाते हैं, न कि संहारिणी‑कापालिक‑स्वरूप के लिए।
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