Posts

Showing posts with the label prarambh

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम्

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् शिव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥१॥ अर्थ:  शिवजी बोले – देवी! सुनो। मैं उत्तम कुञ्जिकास्तोत्रका उपदेश करूँगा, जिस मन्त्रके प्रभावसे देवीका जप (पाठ) सफल होता है॥1॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥ अर्थ:  कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास यहाँतक कि अर्चन भी (आवश्यक) नहीं है॥2॥ कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्। अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥ अर्थ:  केवल कुञ्जिकाके पाठसे दुर्गा पाठका फल प्राप्त हो जाता है। (यह कुञ्जिका) अत्यन्त गुप्त और देवोंके लिये भी दुर्लभ है॥3॥ गोपनीयं प्रयत्‍नेन स्वयोनिरिव पार्वति। मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्। पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥ अर्थ:  हे पार्वती! इसे स्वयोनिकी भाँति प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। यह उत्तम कुञ्जिकास्तोत्र केवल पाठके द्वारा मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि (आभिचारिक) उद्देश्योंको सिद्ध करता है॥4॥ अथ मन्त्रः ॐ ऐं ह...