सुर-सुंदरी योगिनी साधना

सुर-सुंदरी योगिनी साधना

"सुर-सुंदरी" का अर्थ है "देवताओं में भी सबसे सुंदर"। यह आठ प्रमुख योगिनियों में से एक हैं और इन्हें अद्वितीय सौंदर्य, आकर्षण, कला और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इनकी साधना साधक को एक अलौकिक और चुंबकीय व्यक्तित्व प्रदान करती है, जिससे वह जगत को मोहित करने में सक्षम हो जाता है। यह स्वभाव से अत्यंत सौम्य, दयालु और साधक के प्रति पूर्ण समर्पित होती हैं।

सावधानी: यह साधना अत्यंत प्रभावशाली है, इसलिए इसे पूर्ण विश्वास और गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। गुरु न होने पर भगवान शिव को अपना गुरु मानकर साधना शुरू करें।

1. आवश्यक सामग्री

  • सुर-सुंदरी योगिनी यंत्र (ताम्र या स्वर्ण पत्र पर निर्मित)।
  • स्फटिक की माला (या लाल चंदन की माला)।
  • रक्षा माला (साधना के समय गले में धारण करें)।
  • गुलाबी या सफेद रंग का आसन और पहनने के लिए गुलाबी/सफेद वस्त्र।
  • शुद्ध केसर, सफेद चंदन और गुलाब के फूल।
  • गुलाब का इत्र और सुगंधित अगरबत्ती।
  • शुद्ध घी का दीपक।

(नोट: यन्त्र , माला , रक्षा माला मंत्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठित होनी चाहिए।)

2. साधना विधान

साधक किसी भी शुक्रवार या पूर्णिमा की रात्रि में इस साधना को शुरू करें। यह रात्रिकालीन साधना है, इसे रात्रि 10 बजे के बाद ही संपन्न करना चाहिए। साधक उत्तर दिशा की ओर मुख करके गुलाबी आसन पर बैठें। बैठने से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और अपने वस्त्रों पर गुलाब का इत्र लगाएं। अपने सामने लकड़ी की चौकी पर पीला या गुलाबी वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु चित्र और सुर-सुंदरी योगिनी यंत्र स्थापित करें।

3. सुरक्षा घेरा

रक्षा विधान का अर्थ है जहाँ हम पूजा कर रहे है वहाँ यदि कोई आसुरी शक्तियाँ, मानसिक विकार आदि हो तो चले जाएं, जिससे पूजा में कोई बाधा उपस्थित न हो। बाएं हाथ में पीली सरसों अथवा चावल लेकर दाहिने हाथ से ढंक दें तथा निम्न मंत्र उच्चारण के पश्चात सभी दिशाओं में उछाल दें।
"ॐ असर्पन्तु ये भूता ये भूता:भूमि संस्थिता: ये भूता: बिघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया॥ अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचा: सर्वतो दिशम। सर्वेषामविरोधेन पूजा कर्म समारभ्भे॥"

4. विनियोग, करन्यास और अंगन्यास

विनियोग:
दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें: अस्य श्री सुर-सुंदरी योगिनी मंत्रस्य, विश्वामित्र ऋषिः, गायत्री छन्दः, सुर-सुंदरी योगिनी देवता, ह्रीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, मम सौंदर्य-ऐश्वर्य-सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः। (जल जमीन पर छोड़ दें)

करन्यास:

  • ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः
  • ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
  • ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः
  • ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः
  • ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः
  • ॐ ह्रः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

अंगन्यास:

  • ॐ ह्रां हृदयाय नमः
  • ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा
  • ॐ ह्रूं शिखायै वषट्
  • ॐ ह्रैं कवचाय हुं
  • ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्
  • ॐ ह्रः अस्त्राय फट्

5. पूजन और मंत्र जाप

(क) पंचोपचार गुरु पूजन: अपने गुरुदेव का ध्यान करें और पंचोपचार पूजन करें। इसके बाद गुरु मंत्र की एक माला का जाप करें।

(ख) पंचोपचार गणेश पूजन: "ॐ गं गणपतये नमः" की एक माला जाप करें और विघ्न दूर करने की प्रार्थना करें।

(ग) बटुक भैरव पूजन: साधना की रक्षा के लिए भगवान बटुक भैरव का पूजन करें और "ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ" की एक माला जाप करें।

(घ) यंत्र पूजन और मुख्य जाप: यंत्र पर केसर का तिलक करें। गुलाब के पुष्प और इत्र अर्पित करें। अब माला से प्रतिदिन 21 माला जाप करें। यह साधना 11 दिनों तक लगातार करनी है।

मूल मंत्र:
"ॐ ह्रीं आगच्छ सुरसुन्दरी स्वाहा"

6. लाभ और अनुभव

  • सौंदर्य और तेज: साधक के चेहरे पर दिव्य चमक और व्यक्तित्व में आकर्षण आता है।
  • धन और ऐश्वर्य: जीवन में आर्थिक तंगी दूर होती है और सुख-सुविधाएं बढ़ती हैं।
  • अनुभव: साधना के दौरान पायल की मधुर आवाज, गुलाब की खुशबू या किसी अत्यंत सुंदर स्त्री की उपस्थिति का आभास हो सकता है।

7. वचन और प्रत्यक्षीकरण

जब सुर-सुंदरी योगिनी प्रत्यक्ष प्रकट हों, तो उन्हें गुलाब के फूलों की माला अर्पित करें और उनसे अपनी इच्छानुसार मित्र या प्रेमिका के रूप में जीवनभर साथ रहने और सहायता करने का वचन लें।

विशेष सावधानी:

  • साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।
  • अनुभवों को किसी के साथ साझा न करें।
  • सात्विक भोजन ग्रहण करें और मन में पवित्र विचार रखें।
  • योगिनी साधना के अनुभव
  • योगिनी साधना एक अत्यंत तीव्र और संवेदनशील साधना है। इसमें साधक को कई प्रकार के दिव्य और अलौकिक अनुभव होते हैं, जो साधना की सफलता का संकेत देते हैं। ये अनुभव हर साधक के लिए उसके भाव और एकाग्रता के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
योगिनी साधना एक अत्यंत तीव्र और संवेदनशील साधना है। इसमें साधक को कई प्रकार के दिव्य और अलौकिक अनुभव होते हैं, जो साधना की सफलता का संकेत देते हैं। ये अनुभव हर साधक के लिए उसके भाव और एकाग्रता के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
प्रारंभिक अनुभव (पहले 7 दिन)
दिव्य सुगंध: साधना के दौरान अचानक गुलाब, चमेली या किसी अज्ञात दिव्य फूल की बहुत तेज़ सुगंध का आना, जो आसपास मौजूद न हो।
घुंघरुओं की ध्वनि: कमरे में या कानों में पायल या घुंघरुओं की हल्की-हल्की खनक सुनाई देना, खासकर जब बिल्कुल शांति हो।
दिव्य प्रकाश: आँखें बंद करने पर तेज सफेद प्रकाश या अलग-अलग रंगों (जैसे नीला, गुलाबी) की रोशनी का दिखना।
मन में बेचैनी: कभी-कभी मन में अकारण बेचैनी या अत्यधिक उत्साह का अनुभव होना, जो बाहरी ऊर्जा के संपर्क का संकेत है।
मध्यम चरण के अनुभव (8 से 15 दिन)
स्त्री की उपस्थिति का आभास: ऐसा स्पष्ट रूप से महसूस होना कि कमरे में कोई स्त्री मौजूद है या आपके पास से एक साये की तरह होकर गुजरी है।
स्वप्न में दर्शन: सपने में बार-बार किसी अत्यंत सुंदर, गौर वर्ण की स्त्री का दिखना, जो या तो आपको देखती है, मुस्कुराती है, या आपसे बातें करने का प्रयास करती है।
विचारों को पढ़ना: आपके मन में कोई प्रश्न उठने से पहले ही उसका उत्तर किसी संकेत के माध्यम से मिल जाना या किसी आने वाली छोटी-मोटी घटना का पूर्वाभास हो जाना।
फुसफुसाहट की आवाज: कानों में किसी के बहुत धीरे से आपका नाम पुकारने या मंत्र के कुछ शब्द बोलने जैसी आवाज सुनाई देना।
शरीर में कंपन: मंत्र जाप के दौरान रीढ़ की हड्डी में या पूरे शरीर में ऊर्जा के प्रवाह या कंपन का अनुभव होना।
अंतिम चरण के अनुभव (16 से 21 दिन)
स्पर्श का अनुभव: साधना के समय ऐसा स्पष्ट महसूस होना कि किसी ने आपके सिर पर, पीठ पर या हाथ पर बहुत कोमलता से छुआ है।
आसन पर खिंचाव: यह एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। ऐसा महसूस हो सकता है कि कोई आपके आसन को खींच रहा है या आपको उठाने की कोशिश कर रहा है। साधक को इस समय डरना नहीं चाहिए और अपनी साधना जारी रखनी चाहिए।
प्रत्यक्ष दर्शन का आभास: आँखें बंद होने पर भी सामने किसी की स्पष्ट आकृति का दिखना या घुटने से घुटने के स्पर्श का प्रबल आभास होना, जैसे कोई सचमुच आपके बगल में बैठा हो।
वचन या प्रतिज्ञा: स्वप्न में या अर्ध-जागृत अवस्था में योगिनी का दर्शन देकर आपसे कुछ मांगना या आपको कोई वचन देना।
चेतावनी: ये अनुभव साधक को विचलित करने के लिए भी हो सकते हैं। इसलिए, किसी भी अनुभव से न तो अधिक उत्साहित होना चाहिए और न ही भयभीत। अपने गुरु पर विश्वास रखें और साधना जारी रखें। इन अनुभवों को किसी से भी (गुरु के अलावा) साझा न करें, अन्यथा साधना की ऊर्जा बंट जाती है।

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