डाकिनी साधना: रहस्य और विधान, | भूतनी साधना: रहस्य और विस्तृत विधान
डाकिनी साधना: रहस्य और विधान
डाकिनी साधना तंत्र जगत की एक अत्यंत शक्तिशाली और उग्र साधना है। डाकिनी को अक्सर माँ काली की सहायक शक्तियों के रूप में जाना जाता है। इनकी साधना मुख्य रूप से शत्रुओं के समूल नाश, भूत-भविष्य की गुप्त जानकारी प्राप्त करने और असाध्य भौतिक कार्यों को सिद्ध करने के लिए की जाती है। डाकिनी साधना जितनी जल्दी सिद्ध होती है, उतनी ही यह साहसी और दृढ़ संकल्प वाले साधकों के लिए उचित मानी गई है। यह साधना साधक को एक विशेष प्रकार की निर्भयता और वर्चस्व प्रदान करती है।
सावधानी: यह एक अत्यंत उग्र साधना है। इसे केवल एक अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। गुरु न होने पर भगवान शिव (महाकाल) को गुरु मानकर ही प्रारंभ करें।
1. आवश्यक सामग्री
डाकिनी यंत्र (ताम्र या भोजपत्र पर निर्मित)।
काले हकीक की माला।
रक्षा माला (साधना के समय गले में अनिवार्य)।
काले रंग का आसन और पहनने के लिए काले वस्त्र।
शुद्ध सरसों के तेल का चौमुखी दीपक।
काले तिल, उड़द, और लोबान की धूप।
लाल पुष्प और मदिरा (भोग हेतु)।
(नोट: यन्त्र , माला , रक्षा माला , गुटिका मंत्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठित होनी चाहिए।)
2. साधना विधान
यह साधना किसी भी शुक्ल पक्ष के शनिवार, अमावस्या या नवरात्रि की अर्धरात्रि में प्रारंभ करें। यह रात्रिकालीन साधना है, इसे रात्रि 11 बजे के बाद ही संपन्न करना चाहिए। साधक दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले आसन पर बैठें। बैठने से पूर्व स्नान कर स्वच्छ काले वस्त्र धारण करें। अपने सामने लकड़ी की चौकी पर काला वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु चित्र और डाकिनी यंत्र स्थापित करें।
3. सुरक्षा घेरा
साधना शुरू करने से पहले अपने चारों ओर लोहे के चाकू या अभिमंत्रित जल से एक अभेद्य सुरक्षा घेरा बनाएं और इस मंत्र का जाप करें:
"ॐ नमः वज्र ज्वालायै मम शरीरं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।"
4. विनियोग, करन्यास और अंगन्यास
विनियोग:
दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें: अस्य श्री डाकिनी मंत्रस्य, भैरव ऋषिः, पंक्ति छन्दः, डाकिनी देवता, ह्रीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, मम शत्रु-विनाश-कार्य-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः। (जल जमीन पर छोड़ दें)
करन्यास:
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ॐ ह्रः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः
अंगन्यास:
ॐ ह्रां हृदयाय नमः
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा
ॐ ह्रूं शिखायै वषट्
ॐ ह्रैं कवचाय हुं
ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्
ॐ ह्रः अस्त्राय फट्
5. पूजन और मंत्र जाप
(क) पंचोपचार गुरु पूजन:
अपने गुरु डा.नारायणदत्त श्रीमाली जी (या भगवान शिव) का ध्यान करें और उनका पांच वस्तुओं (चंदन, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य) से पूजन करें। इसके बाद गुरु मंत्र की एक माला का जाप करें। गुरु मंत्र "ॐ परमतत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः " या "ॐ नमः शिवाय "
(ख) पंचोपचार गणेश पूजन:
भगवान गणेश का ध्यान करके उनका भी पंचोपचार पूजन करें और विघ्नों के नाश के लिए "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र की एक माला जाप करें।
(ग) बटुक भैरव पूजन:
साधना की रक्षा के लिए भगवान बटुक भैरव का ध्यान करके पंचोपचार पूजन करें "ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुध्धराणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ " मंत्र की एक माला जाप करें।
(घ) यंत्र पूजन और मुख्य जाप: यंत्र पर सिंदूर का तिलक करें और काले तिल अर्पित करें। अब काले हकीक की माला से प्रतिदिन निर्धारित संख्या (11, 21 या 51 माला) में जाप करें। यह साधना 21 दिनों तक लगातार करनी है।
मूल मंत्र:
"ॐ ह्रीं डाकिनी आगच्छ आगच्छ फट् स्वाहा"
6. लाभ और अनुभव
शत्रु दमन: विरोधी स्वयं ही शांत हो जाते हैं।
गुप्त ज्ञान: आने वाली बाधाओं का पूर्व आभास होने लगता है।
अनुभव: साधना के दौरान डरावनी आवाजें, परछाइयां या शरीर में कंपन महसूस हो सकता है। साधक को विचलित नहीं होना चाहिए।
7. वचन और प्रत्यक्षीकरण
जब डाकिनी का स्पष्ट आभास हो या दर्शन हों, तो उन्हें डरे बिना नमन करें और उनसे वचन लें कि वे केवल आपके आदेश पर ही कार्य करेंगी और आपके या आपके परिवार का अहित नहीं करेंगी।
विशेष सावधानी:
साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य और मौन का पालन करें।
अनुभवों को अत्यंत गुप्त रखें।
कमजोर दिल वाले व्यक्ति यह साधना न करें।
भूतनी साधना: रहस्य और विस्तृत विधान
भूतनी साधना तंत्र जगत की एक अत्यंत रहस्यमयी और शीघ्र फलदायी साधना मानी जाती है। 'भूतनी' उन अतृप्त स्त्री आत्माओं को कहा जाता है जिनकी मृत्यु अकाल हुई हो या जिनकी कोई तीव्र इच्छा अधूरी रह गई हो। यह साधना साधक को एक ऐसी अदृश्य शक्ति प्रदान करती है जो उसके आदेशों का पालन करती है और उसे गुप्त सूचनाएं तथा भौतिक सुख प्रदान करती है।
अत्यंत महत्वपूर्ण चेतावनी: यह एक उग्र साधना है। इसे केवल एक अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन और अटूट सुरक्षा कवच के साथ ही करना चाहिए। गुरु न होने पर भगवान शिव (भूतनाथ) को गुरु मानकर ही प्रारंभ करें।
1. आवश्यक सामग्री
भूतनी सिद्धि यंत्र (ताम्र या भोजपत्र पर निर्मित)।
काले हकीक की माला।
रक्षा माला (साधना के समय गले में अनिवार्य)।
काले रंग का आसन और पहनने के लिए काले वस्त्र।
शुद्ध सरसों के तेल का चौमुखी मिट्टी का दीपक।
इत्र (तीव्र खुशबू वाला), लोबान और पुष्प।
गंगाजल और अभिमंत्रित जल।
(नोट: यन्त्र , माला , रक्षा माला , गुटिका मंत्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठित होनी चाहिए।)
2. साधना विधान
यह साधना शुक्ल पक्ष के किसी भी शुक्रवार या शनिवार की रात्रि से प्रारंभ करें। यह रात्रिकालीन साधना है, इसे रात्रि 11:30 बजे के बाद ही संपन्न करना चाहिए। स्थान अत्यंत एकांत, कोई प्राचीन खंडहर या निर्जन स्थान होना चाहिए। साधक दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले आसन पर बैठें।
3. सुरक्षा घेरा और शरीर रक्षा
साधना अत्यंत उग्र है, इसलिए सुरक्षा घेरा बनाना अनिवार्य है। अपने चारों ओर लोहे के चाकू या अभिमंत्रित जल से एक अभेद्य घेरा बनाएं और इस मंत्र का 108 बार जाप करें:
"ॐ नमः वज्र ज्वालायै मम शरीरं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।"
4. विनियोग, करन्यास और अंगन्यास
विनियोग:
दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें: अस्य श्री भूतनी साधना मंत्रस्य, भैरव ऋषिः, पंक्ति छन्दः, भूतनी शक्ति देवता, ह्रीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, मम समस्त कार्य सिद्धयर्थे जपे विनियोगः। (जल जमीन पर छोड़ दें)
करन्यास:
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः
ॐ फट कनिष्ठिकाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं करतल करपृष्ठाभ्यां नमः
अंगन्यास:
ॐ ह्रां हृदयाय नमः
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा
ॐ ह्रूं शिखायै वषट्
ॐ ह्रीं कवचाय हुं
ॐ फट नेत्रत्रयाय वौषट्
ॐ ह्रीं अस्त्राय फट्
5. पूजन और मंत्र जाप
(क) पंचोपचार गुरु पूजन:
अपने गुरु डा.नारायणदत्त श्रीमाली जी (या भगवान शिव) का ध्यान करें और उनका पांच वस्तुओं (चंदन, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य) से पूजन करें। इसके बाद गुरु मंत्र की एक माला का जाप करें। गुरु मंत्र "ॐ परमतत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः " या "ॐ नमः शिवाय "
(ख) पंचोपचार गणेश पूजन:
भगवान गणेश का ध्यान करके उनका भी पंचोपचार पूजन करें और विघ्नों के नाश के लिए "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र की एक माला जाप करें।
(ग) बटुक भैरव पूजन:
साधना की रक्षा के लिए भगवान बटुक भैरव का ध्यान करके पंचोपचार पूजन करें "ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुध्धराणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ " मंत्र की एक माला जाप करें।
(घ) यंत्र पूजन और मुख्य जाप: यंत्र पर इत्र का तिलक करें और पुष्प अर्पित करें। अब काले हकीक की माला से प्रतिदिन निर्धारित संख्या (11 या 21 माला) में जाप करें। यह साधना 11 या 21 दिनों तक लगातार करनी है।
मुख्य मंत्र:
"ॐ ह्रीं आगच्छ भूतनी स्वाहा"
6. लाभ और अनुभव
कार्य सिद्धि: अटके हुए और कठिन भौतिक कार्य पूर्ण होने लगते हैं।
अनुभव: साधना के दौरान पायल की ध्वनि, परछाइयां, या अचानक ठंडी हवा का झोंका महसूस हो सकता है। साधक को विचलित हुए बिना मंत्र जाप जारी रखना चाहिए।
7. वचन और प्रत्यक्षीकरण
जब शक्ति का स्पष्ट आभास हो, तो उससे वचन लें कि वह केवल आपके कल्याणकारी आदेशों का पालन करेगी और आपको या आपके परिवार को कभी कोई हानि नहीं पहुँचाएगी।
विशेष सावधानी:
साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य और मौन का पालन अनिवार्य है।
अनुभवों को अत्यंत गुप्त रखें।
कमजोर हृदय वाले व्यक्ति इस साधना से दूर रहें।
Comments
Post a Comment